श्रृंगार जो रिझाए, पिया मन भाए
Tuesday, 22 November 2016
श्रृंगार जो रिझाए, पिया मन भाए
मित्रों सौंदर्य जहां आकर्षण पैदा करता है वहीं इसे निखाने वाली वस्तुएं इसको वो मारक क्षमता पैदा कर देता है देखने वाला वशीकृत हो जाता है। इन प्रसाधनों में विज्ञान भी छिपा हुआ है और परंपरा भी आईये जानते हैं इनके बारे में-
क्या हैं सोलह श्रृंगार ?
स्त्रियों के लिए हिन्दू शास्त्रों में सोलह श्रृंगार निर्धारित किए गए हैं | प्राचीन ग्रंथो में वर्णित सोलह श्रंगार, आदिकाल से चली आ रही श्रंगार परंपरा की एकरसता को दर्शाती हैं | जानिए
Solah shringar names : सोलह श्रृंगार के नाम-
स्नान (Bathing) : श्रंगार का सर्वप्रथम क्रम स्नान से प्रारंभ होता हैं | शास्त्रानुसार स्नान के भी कई प्रकार होते हैं |
वस्त्र : बिना वस्त्रों के तो सारा सौंदर्य कांतिहीन प्रतीत होता है | प्रस्तर युग से ही शीत, ग्रीष्म से बचने के लिए मनुष्य ने वृक्षों की छाल व पशुओं की खाल से अपना तन ढँकना शुरू कर दिया था | कालांतर में सभ्यता के विकास के साथ-साथ वस्त्रों में भी वैरायटी आ गई | वस्त्रों को विभिन्न वस्तुओं से सजाया भी जाने लगा | वस्त्रों का पहनना मात्र ही उसकी मर्यादा को प्रतीत करता हैं |
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हार : हार पहनने के पीछे वास्तव में स्वाथ्यगत कारण हैं | गले और इसके नजदीकी क्षेत्र में ऐसे प्रेशर बिंदु होते हैं, जिनसे शरीर के कई हिस्सों को लाभ प्राप्त होता होता हैं | इसीलिए हार को सौंदर्य का दर्जा दे दिया गया और हार श्रृंगार का अभिन्न अंग बन गया |
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बिंदी : मस्तक सौंदर्य में बिंदी का महत्वपूर्ण स्थान माना जाता हैं | इसे सौभाग्य का प्रतिक भी कहा गया हैं | शास्त्रों के ज्ञाताओं ने बिंदी लगाने के पीछे कई शास्त्रीय तर्क दियें हैं |
अंजन : आँखों को सुन्दर बनाने के लिए एवं आँखों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से अंजन (काजल) का प्रयोग किया जाता हैं | अंजन का प्रयोग बुरी नजर से बचने के लिए भी किया जाता हैं |
अधरंजन : होंठो या अधरों की सुंदरता बढाने के लिए उन्हें कई रंगो से रंगा जाता हैं | प्राचीन काल में फूलों के रसों द्वारा यह कार्य संपन्न किया जाता था |
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नथ या नथनी : नाक को शोभामय बनाने के लिए नाक में छेद करके कई प्रकार की नथ पहनी जाती हैं | सौंदर्य वृद्धि के साथ-साथ मुख से सम्बंधित बिन्दुओ के द्वारा मुख सौंदर्य बने रखने में नथ सहयोग देती हैं |
केश सज्जा : मुख की आभा बढ़ाने में केशो का महत्वपूर्ण योगदान होता हैं | केशों को सुगन्धित तेलों से सराबोर करके उन्हें विभिन्न आकारों में सजाना, शृंगार को बढ़ा देता हैं |
कंचुकी : प्राचीन काल में स्त्रियों में अधिकतर दो तरह के वस्त्र पहनने की प्रथा थी | अधोवस्त्र तथा उत्तरीय | अधोवस्त्र के साथ कंचुकी को पहना जाता हैं |
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उबटन : प्राचीन काल में विभिन्न प्रकार के फूलों तथा जड़ी-बूटियों से तैयार विशेष प्रकार के उबटन प्रयोग में लाए जाते थे, जो तत्वों को स्निग्ध और कोमल बनाये रखते थे |
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पैंजनियां : पैरों की शोभा के लिए पैंजनियां का प्रयोग होता हैं | मधुर स्वर के साथ इससे छाल में मादकता का आभास होता हैं |
इत्र : सोलह शृंगार में इत्र का महत्वपूर्ण स्थान हैं | इसमें उत्तेजना फैलाने से लेकर आकर्षित करने तक के गुण पाए जाते हैं | प्राचीन काल में फूलों के अर्क से इत्र बनाया जाता था |
कंगन : कलाइयों के सौंदर्य और सौभाग्य का प्रतिक कंगन, अधिकांश स्त्रियों द्वारा धारण किया जाता हैं | कंगन का प्राचीन शास्त्रों में काफी वर्णन मिलता हैं
कमरबंध : कमर को सौंदर्यवान बनाने के लिए कमरबंध का प्रयोग किया जाता हैं | इसे सोने, चाँदी के साथ हीरे, मोती जड़कर विभिन्न आकारों में बनाया जाता हैं |
चरणराग : पैर व हांथो की हथेलियों की सौंदर्य वृद्धि तथा त्वचा की सुरक्षा के लिए मेहंदी लगाने की परम्परा है |
दर्पण : सम्पूर्ण सौंदर्य को निहारने के लिए दर्पण को भी सोलह श्रृंगारों में विशेष दर्ज प्राप्त हैं | सौंदर्य में कमी न रह जाए, इसलिए दर्पण का प्रयोग जरुरी है |
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